जब हम नई कार लेने की सोचते हैं, तब सबसे बड़ा कन्फ्यूजन यही होता है कि बेस मॉडल लें या टॉप मॉडल?
बहुत लोग कहते हैं—“भाई, टॉप मॉडल लेना चाहिए, सब फीचर्स आते हैं।”
वहीं कुछ लोग कहते हैं—“क्या जरूरत है इतने पैसे खर्च करने की? बेस मॉडल भी काम चलाता है।”
तो सच क्या है?
दोनों का फर्क क्या है?
किसमें क्या मिलता है, क्या नहीं मिलता?
कौन सा मॉडल किसके लिए सही है?
इसी सबको आज मैं बहुत ही आसान, आम आदमी वाली भाषा में समझाने वाला हूँ, ताकि आपको यह खुद ही साफ़ पता चल जाए कि आपको कौन सा मॉडल लेना चाहिए।
चलिए शुरू करते हैं…
किसी भी कार कंपनी के पास एक ही गाड़ी के कई variants होते हैं।
उदाहरण—Maruti Swift, Tata Punch, Hyundai Creta, Kia Sonet आदि।
इन्हीं variants में:
अब सवाल ये कि आखिर यह इतना फर्क क्यों होता है?
तो आइए एक-एक करके हर पहलू समझते हैं।
बेस और टॉप मॉडल के बीच कीमत का फर्क काफी बड़ा होता है।
कई बार यह फर्क 1 लाख से लेकर 3–4 लाख तक पहुंच जाता है।
क्यों?
क्योंकि टॉप मॉडल में जो फीचर्स कंपनी देती है, वह महंगे होते हैं—जैसे सनरूफ, टचस्क्रीन, एयरबैग, अलॉय व्हील, कैमरा, सेंसर आदि।
आजकल कंपनियाँ सेफ्टी पर थोड़ा ज्यादा ध्यान दे रही हैं, लेकिन फिर भी बहुत फर्क रहता है।
मतलब:
टॉप मॉडल सुरक्षा के मामले में काफी आगे होता है, जबकि बेस मॉडल सिर्फ जरूरी सेफ्टी तक सीमित रहता है।
यही सबसे बड़ा फर्क होता है।
यानी टॉप मॉडल में आराम का पूरा ध्यान रखा जाता है।
दूरी से देख कर भी पता चल जाता है कि यह टॉप मॉडल है और वो बेस मॉडल।
मतलब टॉप मॉडल देखने में भी ज्यादा आकर्षक और प्रीमियम लगता है।
आज के समय में कार सिर्फ कार नहीं रही, एक गैजेट जैसी हो गई है।
यानी टॉप मॉडल टेक्नोलॉजी में पूरी तरह आगे है।
यहां अच्छी बात यह है कि इंजन लगभग हर मॉडल में एक जैसा ही होता है, चाहे आप बेस लें या टॉप।
फर्क सिर्फ फीचर्स में होता है, शक्ति (power) में नहीं।
हाँ, टॉप मॉडल में कुछ चीजें अधिक होती हैं:
पर बेसिक परफॉर्मेंस दोनों में एक जैसी रहती है।
कई लोग यह गलती से मान लेते हैं कि टॉप मॉडल का मेंटेनेंस ज्यादा महंगा होता है।
असल में ऐसा नहीं है।
Maintenance almost same होता है, क्योंकि इंजन तो सभी में एक जैसा है।
हाँ, कुछ चीजें टॉप मॉडल में होती हैं जो खराब हों तो महंगी होती हैं—जैसे:
लेकिन सामान्य सर्विस की लागत दोनों में एक जैसी ही रहती है।
अगर आप:
तो बेस मॉडल आपके लिए बेस्ट ऑप्शन है।
बहुत लोग ऐसा भी करते हैं कि बेस मॉडल लेते हैं और फिर:
बाजार से लगवा लेते हैं।
इससे पैसे भी बच जाते हैं और फीचर्स भी आ जाते हैं।
अगर आप:
तो टॉप मॉडल आपके लिए सही है।
टॉप मॉडल की खास बात यह है कि सब कुछ कंपनी फिटेड होता है, कोई टेंशन नहीं रहता।
देखिए, हर इंसान का बजट और जरूरत अलग होती है।
इसलिए एकदम सीधी सलाह देता हूँ:
बेस मॉडल लें + जरूरी एक्सेसरी लगवा लें।
कम पैसे में आपको अच्छी कार मिल जाएगी।
मिड या टॉप मॉडल लें।
ये लंबे समय में ज्यादा वैल्यू देते हैं।
टॉप मॉडल ही सही है।
कंपनी फिटेड चीजों का मज़ा ही अलग होता है।
बेस मॉडल और टॉप मॉडल दोनों अपनी जगह सही हैं।
आखिरकार कार वही अच्छी होती है जो आपकी जेब और आपकी जरूरत दोनों को फिट आए।
अगर आपका बजट कम है तो बिल्कुल मत सोचिए, बेस मॉडल भी शानदार चलता है।
और अगर आप फीचर्स और कम्फर्ट प्रेफर करते हैं, तो टॉप मॉडल निश्चित रूप से बेहतर है।
उम्मीद है अब आपको पूरा फर्क समझ में आ गया होगा।
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